Friday, October 2, 2026

 

यात्रा संस्मरण

विश्व-विरासत साँची के स्तूप : एक यात्रा

स्तूप क्रमांक 1 पर लेखक 

-हरिशंकर राढ़ी

इतनी यात्राओं के बावजूद विश्वप्रसिद्ध और घोषित विश्व विरासत साँची के स्तूप न जाने कैसे अनदेखे रह गए थे। तथापि, ‘देर आयद, दुरुस्त आयद’ की तर्ज पर जब 30 सितंबर, 2026 को मित्र बद्रीप्रसाद के साथ दक्षिण एक्सप्रेस से विदिशा रेलवे स्टेशन पर उतरा तो प्लेटफॉर्म पर ‘विदिशा’ लिखा हुआ देखकर प्रसिद्ध संस्कृत कवि बाणभट्ट की ‘कादंबरी’ का वाक्य ‘विदिशाभिधाना नगरी राजधान्यासीत्’ याद आ गया। यह राजधानी विदिशा शूद्रक नामक राजा की थी। महाकवि बाणभट्ट ने अपनी भाषा की समृद्धि दिखाने के प्रयास में राजा शूद्रक तथा उसकी राजधानी विदिशा को इतना समृद्ध दिखा दिया कि संभवतः कल्पना भी उससे आगे नहीं पहुँच सकती। वह विदिशा तो संभवतः बाणभट्ट की ‘कादंबरी’ के अतिरिक्त कहीं मिल ही नहीं सकती थी, जबकि मैं विदिशा रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म संख्या चार पर खड़ा यह समझने का प्रयास कर रहा था कि किस दिशा में निकलूँ ताकि सही होटल मिल जाए।

पहले से जुटाई गई कुछ जानकारी और वहीं बेंच पर बैठे एक-दो छात्रों से जानकारी को पुष्ट करके प्लेटफॉर्म संख्या एक की ओर से निकल पड़ा। विदिशा का मुख्य बाजार और बहुतायत होटल इसी ओर हैं। स्टेशन से बाहर निकलते ही पचास मीटर के अंदर हमें वांछित होटल मिल गया। वहाँ चेक इन करके हम नहाने-धोने और आगे की यात्रा की तैयारी में लग गए। हमारे पास आज का ही दिन था। मैं प्रायः इतनी छोटी अवधि की यात्राएँ नहीं बनाता। जहाँ जाइए, एक-दो दिन ठहरिए। इत्मीनान से घूमिए, शांति और आराम फरमाइए, फिर लौटिए। किंतु विदिशा के लिए एक दिन पर्याप्त होता है। यहाँ से आगे भोपाल जाने का सुविचार था, विशेषकर कुछ लेखक मित्रों से मिलने, किंतु बात नहीं बनी।

तोरणद्वार की नक्काशी 

पूर्वाह्न लगभग 11 बजे हमने मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध पोहा-चाय उदरस्थ करके साँची विश्व विरासत जाने के लिए उद्यत हो गए। साँची विदिशा-भोपाल मार्ग पर लगभग नौ किमी की दूरी पर स्थित है। कुछ पैसेंजर गाड़ियाँ भी साँची में रुकती हैं; बस अड्डे से भोपाल वाली बसें भी मिल जाती हैं, किंतु हमने ऑटो-रिक्शा को प्राथमिकता दी।

स्तूप क्रमांक 1 का पूर्वी दृश्य 

साँची के स्तूप एक ऊँची पहाड़ी पर बने हुए हैं। पहाड़ी के नीचे स्तूप में प्रवेश के लिए टिकटघर और संग्रहालय है। इस समय भारतीय वयस्क के लिए टिकट दर चालीस रुपये प्रति व्यक्ति है। बाहर से आए ऑटो तथा अन्य टैक्सियों को यहाँ से आगे चढ़ाई पर जाने के लिए अनुमति नहीं है। कुछ स्थानीय ऑटो रिक्शा बीस रुपये प्रति सवारी स्तूप के द्वार तक पहुँचा देते हैं। हमने भी इस सुविधा का लाभ उठाया और हरे-भरे जंगल के बीच से होते हुए विश्व विरासत साँची के बौद्ध स्तूप पर पहुँच गए।

मुख्य प्रवेशद्वार से ही स्तूप क्रमांक एक के दर्शन शुरू हो जाते हैं। परिसर में स्थित कुल तीन स्तूपों में स्तूप क्रमांक एक सबसे विशाल, शानदार और आकर्षक है। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के अधीन देखरेख में साँची स्तूपों का यह परिसर इस अर्थ में भी प्रशंसनीय है कि यहाँ विविध प्रकार के वृक्षों की हरीतिमा सौंदर्य द्विगुणित करती है। प्रवेशद्वार पर टिकट दिखाकर हम अंदर प्रवेश करते हैं कि लगभग 100 मीटर आगे चलने पर स्तूप क्रमांक एक का उत्तरी प्रवेशद्वार है। इस स्तूप पर चारो दिशाओं में चार प्रवेशद्वार हैं, जिन पर तथागत बुद्ध के जीवन से संबंधित जातक-कथाओं को नक्काशी के माध्यम से उभारा गया है।

एक मंदिर का ध्वंशावशेष 

कहा जाता है कि इन स्तूपों के निर्माण हेतु सम्राट अशोक ने साँची को इसलिए चुना था, क्योंकि विदिशा में उसकी ससुराल थी। सम्राट अशोक की पत्नी देवी विदिशा के एक व्यापारी की पुत्री थीं। उनका विवाह साँची में हुआ था। इसके अतिरिक्त सम्राट अशोक को लगा कि प्राकृतिक रूप से समृद्ध इस स्थान पर चिंतन-मनन व ध्यान में सुविधा होगी। संभवतः उसका उद्देश्य इसे शिक्षा एवं ज्ञानार्जन के एक बड़े बौद्ध केंद्र के रूप में स्थापित करने का रहा होगा। प्राचीन काल में साँची को काकनाय, काकनाव, काकनादबोट एवं बोटश्री पर्वत के नाम से जाना जाता था।

स्तूप क्रमांक एक अपने तोरणद्वार संख्या एक सहित भारतीय मुद्रा के दो सौ रुपये के पृष्ठ भाग पर अंकित है। किसी ने बताया कि ये स्तूप ईसापूर्व दो सौ वर्ष के आसपास के हैं, इसलिए इसे दो सौ के नोट पर छापा गया है। जो भी हो, एक विचित्र सत्य यह है कि जो नोट पर छप गया, उसका महत्त्व होना ही है। स्तूप क्रमांक तीन में तथागत के शिष्य सारिपुत्र एवं महामोग्गलान की अस्थियाँ संरक्षित हैं।

सम्राट अशोक ने तथागत बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद उनकी अस्थियों को यहाँ लाकर स्तूप में संरक्षित करने का कार्य किया। कुशीनारा में तथागत के परिनिर्वाण के बाद उनकी अस्थियों के बँटवारे को लेकर विवाद चलता रहा, जिसका समाधान द्रोण नामक ब्राह्मण ने समझा-बुझाकर किया। उनकी अस्थियों का कुछ अंश साँची लाया गया तथा स्तूप क्रमांक एक में रखा गया। यहीं से सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा ने साँची से ही श्रीलंका, म्यांमार और थाईलैंड की अपनी धर्मप्रसार यात्रा प्रारंभ की थी। यह जगह तब वेदसगिरि कहलाती थी।

स्तूप क्रमांक एक के पिछले तोरणद्वार पर 42 फीट ऊँचा अशोक स्तंभ था, जो केवल एक पत्थर से निर्मित था। शीर्ष पर चार दिशाओं में मुँह किए चार सिंहों की मूर्तियाँ थीं। कालांतर में यह खंडित हो गया। खंडित स्तंभ का एक छोटा हिस्सा अभी भी तोरणद्वार के पास स्थित है। ऊपर का कुछ अंश तथा चारो सिंह साँची स्थित भारतीय पुरातत्त्व के संग्रहालय में संरक्षित है।

साँची, 1912 में

साँची के स्तूपों की यह समृद्ध विश्व-विरासत सन् 1818 तक अज्ञात रही। धन्यवाद ब्रिटिश अधिकारी जनरल हेनरी टेलर को जिसने 1818 ई. में इसकी खोज की। साँची स्तूपों को वर्तमान दर्शनीय स्वरूप देने का वृहत्तर श्रेय अंगरेज पुरातत्त्व विशेषज्ञ जॉन मार्शल को जाता है। 1876 में जन्मे मार्शल को मात्र 26 वर्ष की उम्र में भारतीय पुरातत्त्च सर्वेक्षण का महानिदेशक नियुक्त कर दिया गया। साँची के बौद्ध स्तूपों के अनुसंधान और जीर्णोद्धार का कार्य उसने सन् 1912 में प्रांरभ किया और 1919 तक सतत् रूप से कार्यरत रहा। हालाँकि इससे पूर्व शाहजहाँ बेगम और बाद में उनकी पुत्री सुल्तान कैखुशरू जहाँ बेगम ने सन् 1868 से 1901 तक इसके संरक्षण तथा पुननिर्माण में महती योगदान दिया।

जॉन मार्शल का बँगला 

स्तूपों का भ्रमण करते-करते लगभग तीन बज गए थे। विदिशा नगरी में किया गया पोहे के नाश्ते का प्रभाव समाप्त हो गया था और जोर की भूख लग आई थी। लगातार घूमते रहने से भूख बरदाश्त नहीं हो रही थी। यहाँ भोजन का कोई विकल्प नहीं था, सिवाय प्रवेशद्वार पर स्थित एक छोटी-सी चाय-पानी मैगी-बिस्कुट की दुकान के। यहीं हमने एक-एक पैटीज ली और कामचलाऊ भूख मिटाकर पैदल ही नीचे के ओर चल पड़े। अभी हमें संग्रहालय देखने जाना था।

यहाँ का पुरातत्त्व संग्रहालय काफी व्यवस्थित और अच्छी स्थिति में है। संग्रहालय में वीडियोग्राफी तथा सेल्फी निषिद्ध है, किंतु फोटो ले सकते हैं। तीन-चार बड़े कक्षों में साँची एवं निकटवर्ती बौद्ध स्थलों के अवशेष, खंडित प्रतिमाएँ तथा अन्य पुरातात्त्विक महत्त्व के सामान रखे हुए हैं। इसी परिसर में जॉन मार्शल का बंगला भी है, जो बहुत अच्छी स्थिति में है।

ध्वंश अवशेष 

इन स्थानों का अवलोकन अध्ययन करते हुए हमें लगभग चार बज गए। साँची के पास ही उदयगिरि की गुफाएँ हैं, जहाँ बौद्ध धर्म के कई स्मारक हैं। हमारा कार्यक्रम साँची-विदिशा में आज रात में वापसी का था, इसलिए वहाँ जाने का कार्यक्रम टाल दिया गया। यहाँ से हमें विदिशा लौटना था। आस-पास चाय इत्यादि की कुछ टपरियाँ हैं। निकट ही भोपाल-विदिशा राजमार्ग है। यहाँ खाने-पीने के अच्छे रेस्तराँ नहीं हैं। शाम हो गई थी और चाय की तलब लग आई थी। एक टपरी पर हमने चाय पी और आज की यात्रा की समीक्षा करते हुए विदिशा की बस पकड़ी और होटल वापस आ गए।

हमारी ट्रेन रात के साढ़े ग्यारह बजे थी। उदयगिरि तथा अन्य स्थानों को देखने के लिए एक बार पुनः आने की इच्छा सहित हमने खुशी-खुशी बाणभट्ट की ‘विदिशाभिधाना राजधानी’ से विदा ली और अपनी शायिका पर सो गए।

यक्षिणी की प्रतिमा 

(01 अक्टूबर, 2026)

 

Tuesday, June 30, 2026

 

हरिशंकर राढ़ी की ग़ज़ल 

हरिशंकर राढ़ी की ग़ज़ल 

हरिशंकर राढ़ी की ग़ज़ल 

हरिशंकर राढ़ी की ग़ज़ल 

हरिशंकर राढ़ी की ग़ज़ल 

हरिशंकर राढ़ी की ग़ज़ल 






ग़ज़ल

-    हरिशंकर राढ़ी

हरसू ही उत्पात चलेगा क्या कर लोगे बाऊजी ?

घात और प्रतिघात चलेगा क्या कर लोगे बाऊजी?

बाहर संसद से आ करके  तुमको खूब सिखाएँगे

अंदर लातमलात चलेगा क्या कर लोगे बाऊजी ?

जब तक राशन के बदले तुम वोट थमाते जाओगे

तब तक ये खैरात चलेगा क्या कर लोगे बाऊजी?

तख्ते – ताऊस पर बैठी  चालाकी ठट्ठे मारेगी  

घुटनों पर ज़ज़्बात चलेगा क्या कर लोगे बाऊजी?

मंदिर-मस्जिद, गुरूद्वारे तो शाम ढले सो जाएँगे

ठेका सारी रात  चलेगा  क्या कर लोगे बाऊजी?

तुम पी-एच.डी. कर लो चाहे कितने नंबर ले आओ

इंटरव्यू  में  नात चलेगा क्या कर लोगे बाऊजी?

सत्ता में अज्ञात और विख्यात नहीं चल पाता है

इसमें बस कुख्यात चलेगा क्या कर लोगे बाऊजी?

(30 मई, 2026)

Tuesday, May 26, 2026

  'साहित्य के शनिदेव'

हरिशंकर राढ़ी के चौथे व्यंग्य संग्रह 'साहित्य के शनिदेव'का विमोचन संपन्न

साहित्य के शनिदेव 
हरिशंकर राढ़ी का चौथा व्यंग्य संग्रह 'साहित्य के शनिदेव' न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली से प्रकाशित होकर या गया है. इसका विश्व पुस्तक मेल नई दिल्ली में सम्पन्न हुआ। विमोचन समरोह में वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री सुभाष चंदर, व्यंग्यकार और व्यंग्यलोचक श्री रणविजय राव, 'नई धारा' के संपादक श्री शिवनारायण जी, NBT के हिंदी संपादक श्री दीपक कुमार गुप्ता युवा व्यंग्यकार श्री सुमित प्रताप सिंह, युवा लेखक श्री सुमित राजौरा, समकालीन अभिव्यक्ति के संपादक श्री उपेंद्र कुमार मिश्र, न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन के श्री चंद्रा जी तथा अन्य अनेक मित्र एवं पाठकगण सम्मिलित रहे.



विमोचन करते वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री सुभाष चंदर, रणविजय राव,
दीपक गुप्ता,उपेन्द्र कुमार मिश्र, सुमित प्रताप सिंह,
सुमित राजोरा तथा अन्य साहित्यकार 

हरिशंकर राढ़ी के इस व्यंग्य संग्रह में विभिन्न विषयों को लेकर कुल 35 व्यंग्य हैं , जो समकालीन समाज की विसंगतियों पर वार करते हैं। यह संग्रह amazon पर उपलब्ध है।




 'नयन और बानी'

हरिशंकर राढ़ी के ललित निबंध 'नयन और बानी' का लोकार्पण

ललित निबंध संग्रह का मुखपृष्ठ 
दिनांक 15 जनवरी, 2026 को दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले के हॉल नंबर 2 में ‘सर्व भाषा ट्रस्ट’ के स्टॉल पर मेरे दूसरे ललित निबंध संग्रह के ललित निबंध संग्रह 'नयन अरु बानी' का विमोचन और लोकार्पण सम्पन्न हुआ। मेरे ललित निबंध के साथ ही उपेन्द्र कुमार मिश्र के ग़ज़ल संग्रह 'दिल के समंदर में' का भी विमोचन हुआ।

इस अवसर पर प्रसिद्ध नाटककार एवं कवि डॉ. प्रताप सहगल जी, कवयित्री डॉ. शशि सहगल जी, प्रखर आलोचक-कवि डॉ ओम निश्चल जी, कवि- लेखक और दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के असोशिएट प्रो वेद मित्र शुक्ल जी, नेशनल बुक ट्रस्ट में संपादक श्री दीपक गुप्ता जी, युवा व्यंग्यकार श्री सुमित प्रताप सिंह तथा सर्व भाषा ट्रस्ट के निदेशक श्री केशव मोहन पांडेय जी की गरिमामयी उपस्थिति रही।

विमोचन करते वरिष्ठ साहित्यकार डॉ प्रताप सहगल, डॉ शशि सहगल, डॉ ओम निश्चल, डॉ वेद मित्र शुक्ल, श्री उपेन्द्र कुमार मिश्र 
विमोचन का एक और दृश्य 


कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ ओम निश्चल जी ने किया, जो संचालन के साथ एक सक्षम आलोचक की भूमिका में भी रहते हैं। कवि तो हैं ही। उनका बहुआयामी व्यक्तित्व कार्यक्रम को एक ऊंचाई प्रदान करता है। विमोचन में उपस्थित साहित्यकारों ने दोनों पुस्तकों और लेखकों पर अपने अमूल्य विचार रखे, जो हमारे लिए प्रेरक रहा।






विमोचन में सहधर्मिणी शशि तथा आत्मीय जन 
इस अवसर पर अनेक साहित्यकार, साहित्यप्रेमी तथा आत्मीय जन बड़ी संख्या में उपस्थित थे। इस अवसर पर उपस्थित होकर जिन आत्मीय जनों, साहित्यकारों ने हमारा उत्साहवर्धन किया, उनका बहुत-बहुत धन्यवाद और आभार!
सर्व भाषा ट्रस्ट ' के निदेशक श्री केशव मोहन पांडेय जी का हार्दिक आभार, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी इन पुस्तकों का प्रकाशन और लोकार्पण संभव कराया।