व्यंग्य संग्रह ‘अंधे पीसें...’
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मेरे लिए यह प्रसन्नता का विषय है कि मेरा तीसरा व्यंग्य संग्रह ‘अंधे पीसें...’ सर्व भाषा ट्रस्ट से प्रकाशित होकर आ चुका है। इसमें पिछले 2-3 वर्षों में लिखे व्यंग्यों का संग्रह है, जिसमें कुल 35 व्यंग्य सम्मिलित हैं। समाज, सत्ता एवं मानवीय विसंगतियों के इर्द-गिर्द घूमते ये व्यंग्य अपने लक्ष्य का संधान करते हुए बेहतर व्यवस्था और समाज की अप्रकट कामना रखते हैं, जो गुदगुदाने की अपेक्षा जगाने के लिए लिखे गए हैं।
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